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Friday, 3 May 2013

प्रेसपालिका : 01 मई, 2013 में प्रकाशित शायरी

ढूंढने से भी नहीं मिलता हमें अपना वजूद।
हो गयी हैं, आज तन्हा और भी तन्हाईयॉं॥

उनकी  बज्मे  नाज  में  कुछ  मांगने  जाते नहीं।
अपना मकसद है कि बस उनके खयालों में रहें॥

इस  दिखावे  के  दौर  में  हमने, हर  कदम  पर  फरेब  खाये  हैं।
भूल जाऊं मैं किस तरह उसको, जहनो दिल पर जो मेरे छाये हैं॥

बदलते  मौसमों  के  बदले  तेवर,  खबर  तूफान  की  देते  नहीं हैं।
वो क्या बांटेंगे अपनी मुस्कुराहट, जो औरों को खुशी देते नहीं हैं॥

बात कुछ तो है जो उनकी मुझ पे है नजरे करम।
बेसबब  कोई  किसी  पर  मेहरबां  होता  नहीं॥

सभी को देख लिया मैंने वक्त पड़ने पर।
हर एक शख्स को मैं आजमाये बैठा हूँ॥

गर यकीं  मुझ पर  नहीं तो  आइनों  से  पूछ लो।
दिल हंसी मिलता है तो सूरत हंसी मिलती नहीं॥

झुकी-झुकी सी निगाहों से मिल गया मुझको।
न  दो  सवाल  का  मेरे  जवाब,  रहने  दो॥

मुझको डर है खुद अपनी ही नजर न उसको लग जाये।
आईने  में  देख  के  जब  भी  अपना  रूप  संवारे  वह॥

स्त्रोत : दीवाने-ए-मयंक, के. के. सिंह ‘मयंक’ अकबराबादी

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