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Tuesday, 18 March 2014

प्रेसपालिका : 16 मार्च, 2014 में प्रकाशित शायरी

नहीं शिकवा मुझे कुछ तेरी बेवफाई का हरगिज।
गिला तब हो अगर तूने किसी से भी निभाई हो॥ अज्ञात

जब तब थे मिले ये तो जुदाई थी कयामत।
अब मिलके बिछुड़ जाने का गम याद रहेगा॥ सुहेल मुरादाबादी


जैसे कोई डूबने वाला चीखे पानी में।
अब तो मेरा हर इक सपना यूँ मुझ बिन चिल्लाता है॥ नजबी

मुहब्बत तक नादानी सही, लेकिन खिरदमन्दो।
जवानी में ये नादानी हंसी मालूम होती है॥ नरेश कुमार शाद


बरसों के बाद बाग में चहकी हैं बुलबुलें।
गुमसुम हैं मगर पेड़ सभी, साथी क्या वजह हुई॥ डॉ. उर्मिलेश

दिल की मजबूरी की क्या शै है कि दर से अपने।
उसने सौ बार उठाया तो मैं सौ बार आया॥ हसरत मोहानी


दुनिया ने किसका राहे-फानी में दिया है साथ।
तुम भी चले-चलो यूँ ही, जब तक हवा चले॥ मिर्जा जौक

तुम मुस्कुरा दिये तो उम्मीदें भीं हँस पड़ी।
दिल डूबने को था के किनारा मिला मुझे॥ मुस्फा सबा

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