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Sunday, 7 April 2013

प्रेसपालिका : 01अप्रेल, 2013 में प्रकाशित शायरी

उंगलियों पर हम गिना दें, हों अगर दो चार दस।
कामयाबी पर हमारी जलने वाले हैं बहुत॥

बदलने को तो हर लम्हा ही मैंने करवटें बदली।
करारे जिन्दगी पाया न इस करवट न उस करवट॥

फूल खिलाता था जो कल तक, आज वो कांटे बोता है।
फर्क आखिर यह कैसे आया, मैं भी सोचूँ तू भी सोच॥

उगते सूरज की इबादत की जिन्होंने उम्रभर।
जश्‍न वह कैसे मनायें शाम ढल जाने के बाद॥

पहले मेरी जिन्दगी पर छाये थे रस्मो रिवाज।
भूल बैठा हर रिवायत, आप से मिलने के बाद॥

आरजू जन्नत की लेकर दर-बदर भटका किये।
स्वर्ग लेकिन मिल सका बस अपने घर जाने के बाद॥

बन के तुम्हारी याद महकती रही सदा।
जूही, चमेली, रात की रानी तमाम उम्र॥

स्त्रोत : दीवाने-ए-मयंक, के. के. सिंह ‘मयंक’ अकबराबादी

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