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Sunday, 10 March 2013

प्रेसपालिका : 01 फरवरी, 2013 में प्रकाशित शायरी

मैं मांगने गया था वहां जिन्दगी मगर|
फरमान मेरी मौत का इरशाद हो गया॥

नफरतों की चोटियों पर बैठकर रोता रहा|
जिसने दिल की खाइयों को प्यार से पाटा न था॥

पहले मेरे कसीदे पढे, फिर नजर से गिराया गया|
जर्मे उल्फत की इतनी सजा, आसमां से गिराया गया॥

यारों ये कहावत भी इक जिन्दा हकीकत है|
किस्मत में कनीजों के रनिवास नहीं होता॥

खेलने के लिये जिसको दिल चाहिये, वह खिलौनों से कैसे बहल जायेगा|
फिर न आयेगा वापस कभी लौटकर, तीर जो भी कमां से निकल जायेगा॥

ऐ दोस्त जमीर अपना इक ऐसा नजूमी (ज्योतिषी) है|
आगाज से पहले ही अंजाम बता देगा॥

आइये आ जाइये अब तो करीब आ जाइये|
प्यास नजरों की बुझाये इक जमाना हो गया॥

स्त्रोत : दीवाने-ए-मयंक, के. के. सिंह ‘मयंक’ अकबराबादी

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