मैं मांगने गया था वहां जिन्दगी मगर|
फरमान मेरी मौत का इरशाद हो गया॥
नफरतों की चोटियों पर बैठकर रोता रहा|
जिसने दिल की खाइयों को प्यार से पाटा न था॥
पहले मेरे कसीदे पढे, फिर नजर से गिराया गया|
जर्मे उल्फत की इतनी सजा, आसमां से गिराया गया॥
यारों ये कहावत भी इक जिन्दा हकीकत है|
किस्मत में कनीजों के रनिवास नहीं होता॥
खेलने के लिये जिसको दिल चाहिये, वह खिलौनों से कैसे बहल जायेगा|
फिर न आयेगा वापस कभी लौटकर, तीर जो भी कमां से निकल जायेगा॥
ऐ दोस्त जमीर अपना इक ऐसा नजूमी (ज्योतिषी) है|
आगाज से पहले ही अंजाम बता देगा॥
आइये आ जाइये अब तो करीब आ जाइये|
प्यास नजरों की बुझाये इक जमाना हो गया॥
स्त्रोत : दीवाने-ए-मयंक, के. के. सिंह ‘मयंक’ अकबराबादी
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